सोमवार, 6 सितंबर 2010

नागरिकता

मित्र आपने अच्छा सवाल उठाया है। यह बुनियादी हकों से जुड़ा मामला है। खुली अर्थवयवस्था में और भी बहुत कुछ खुलकर सामने आ गया है। बड़ी कम्पनियों से बड़ा लाभ पाने की उम्मीद में उनके क़दमों में बिछ जाने वाले हमारे राजनेताओं ने मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग को कभी भी वोटों से जयादा कुछ माना ही नहीं। विश्वसनीयता की हालत तो कभी भी छिपी नहीं रही, भावना में बहकर नारे लगाने वाले भी जरा सा होश आते ही सच बोलने लगते हैं। राजनीति को तो जाने दीजिये, पूंजी के सामने पूरी तरह से समर्पण कर चुके समाज में भी इतनी नैतिकता शेष नहीं कि अपने सामने हो रहे अनाचार को गलत कहकर अपना पक्ष रख सके। रही बात सरकार की तो मित्र इसे ना ही छेड़ें , सरकार की जिम्मेदारी तो अच्छा खासा चुटकुला है।
यह आवाज आपके दिल से निकली है...इसलिए दिल को छूती है।

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